Wednesday, May 31, 2017

बेटी होने का मतलब

माँ की कोख के अंदर ज़िन्दगी में ढली मैं ,
पिता के हांथों के पालने में खेली-पली मैं ,
आँगन की चिरैया सी चहक-चहक के डोली ,
प्यारी मुस्कान के संग,खिलौनों की झोली।

भाई-बहन के रिश्ते का,पाया ढेर सा प्यार ,
सखियों संग सवालों,और जवाबों की बाहर ,
हर दिन,हर पल गुज़रा,ढलीं चांदनी रातें भी ,
बदले कई मौसम,गईं कितनी बरसातें भी।

ख़्वाब हुए जवान,यौवन रंग भी दिखाएगा ,
इंद्रधनुष पे सवार,कोई राजकुमार आएगा ,
सपने क्या थे बस,अपनी जादुई  दुनिया थी ,
रंगीन उधेड़-बुन से बुनी दिल की पुड़िया थी।

फिर माँ की चिंता और था बाबुल का हिसाब ,
पसंदी न पसंदी के,अजीब से सवाल-जवाब ,
फिर सात फेरों संग,बेटियां पराई बनाने की ,
ऐसी ही तो ये रीत है,घर-आँगन छुड़ाने की।

संग आई थी प्रीत लिए,हर रिश्ता निभाने को ,
दिखीं तौलती सी आँखें,बस बातें ही बढ़ाने को ,
ढेरों उम्मीदें और,जिम्मेदारियों भरा बोझ था ,
बात-बात पे टिप्पणी थी,ताना और क्रोध था।

मेरे सुनहरे से सपनों के पंख,क़तर दिए सारे ,
लक्ष्मण रेखा नियमों की,बिना किसी सहारे ,
अकेले ही चलना था,अकेले ही सम्हलना था ,
ससुराल के नियमों में,अकेले ही ढलना था।

ख़ुशी,उत्साह,ख़्वाबों ने,जिम्मेदारियां ओढ़ीं ,
प्रश्न,प्रश्न बस प्रश्नों ने,उम्मीदें सब छोड़ीं ,
काश! लोग सात फेरों के संग,अपना बनाते ,
शरीर संग सुख-दुःख और आत्मा अपनाते।

अपना बनाने को जो लाए थे ,तो अपना बनाते ,
पराया कहना क्यों,और क्यों शिकवा,शिकायतें
बेटे संग उसकी सहचरी को भी,गले से लगाते ,
पीढ़ी बढ़ाने वाली का भी,काश! सम्मान बढ़ाते ,

फिर न बिखरतीं,न चढ़तीं बेटियां दहेज़ बलि ,
न बेटी पैदा होने पे,समाज में मचती खलबली ,
न राहों में असुरक्षित,माहौल ही कोई मिलता ,
दोयम दर्जे का अहसास,यूँ न मन में पलता |

तो जीवन के मायने,अलग ही कुछ और होते ,
बेटी के जन्म लेने पर माँ-बाप,कभी न रोते ,
बेटी जन्मने पे भी घरों में,जश्न खूब मनाते ,
गर बहू-बेटियों को भी,हम बेटों सा अपनाते | 

                                                                 ( जयश्री वर्मा )






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