Saturday, March 18, 2017

तुम ही बताओ
















ये निगाहें इक अजीब सा ही गुनाह किये जाती हैं,
इधर-उधर भटकती सी तुम पे ही ठहर जाती हैं।
ये ज़ुबाँ है कि लफ़्ज़ों संग खेलना शौक है इसका,
पर क्यों ये तुम्हारे सामने बेज़ुबान सी बन जाती है।

ख़्वाब हैं कि ये तो,तुम्हारा तस्सवुर सजाए रहते हैं,
पलकें हैं कि ये तो रात भर,रतजगा किये जाती हैं।
ये हाथ मेरे,हाल-ए-दिल लिख के,तुम्हें बताना चाहें,
पर ये कलम है कि,ज़माने के खौफ से घबराती हैं।

ये कदम हैं जोकि गुज़रे हैं,कई मोड़,कई राहों से,
आता है जब दर तेरा,बिन रोके ही ठिठक जाते हैं।
दिल ने तो चाहा है तुम्हें,खुद से भी ज़्यादा टूट कर,
इज़हार करना चाहे पर,अलफ़ाज़ ही खो जाते हैं।

ख़ैरख्वाहों ने कहा,ये जुनून है,राह है भरी काँटों से ,
शूल के डरसे क्या,मुहब्बत छोड़ी,किसी ने फूल से?
खुदा के बनाए इन,पाक-प्यार के एहसासों के संग,
जीवन की इस खूबसूरती को,हम कैसे नकार जाएं?

तुम ही बताओ कि कैसे हम,तुम्हें एहसास दिला पाएं,
इस दिल के इन जज़्बातों को,तुम तक कैसे पहुंचाएं?
तुम्हारे लिए कितना आसान है,यूँ बेख्याल बन जाना,
पर हम सरीखे,शमा पे मिटने वाले,परवाने कहाँ जाएं ?

                                                                 जयश्री वर्मा

10 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 20 मार्च 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. इस सम्मान के लिए सादर धन्यवाद आपका यशोदा अग्रवाल जी !

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  2. बहुत सुन्दर कविता |

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    1. सादर धन्यवाद आपका अर्चना सक्सेना जी !

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    1. कविता की सराहना लिए धन्यवाद आपका सुशील कुमार जाशी जी !

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  4. सुंदर रचना।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका ध्रुव सिंह जी !

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  5. ख़ैरख्वाहों ने कहा,ये जुनून है,राह है भरी काँटों से ,
    शूल के डरसे क्या,मुहब्बत छोड़ी,किसी ने फूल से?
    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति जयश्री जी :)
    बहुत दिनों बाद आना हुआ ब्लॉग पर प्रणाम स्वीकार करें

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    1. जी हाँ !बहुत दिनों बाद आना हो सका !धन्यवाद आपका कविता पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए संजय भास्कर जी !

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