Friday, December 9, 2016

ओ सृष्टि जननी

ओ पावन जीव जननी जलधार,महिमा तेरी अपरम्पार,
तेरे कारण ही,इस धरती पे फैला,इस सृष्टि का संचार,
तेरे वज़ूद के कारण ही,यह पृथ्वी,है नीला ग्रह कहलाई,
नदी किनारे बसीं सभ्यताएं,और विराटता इसने पाई।

तूने जलचर,थलचर,नभचर,सबकी ही प्यास बुझाई है,
तू जहाँ-कहीं से गुज़री जग में,वहीं पे हरियाली छाई है,
अपनी धुन में चंचल लहरों से,मधुर संगीत सुनाती तू,
हर बाधा को पार कर हमें,है जीवन का मर्म बताती तू।

है चहुँ और स्पंदन नदियों से,और नदियों से ही संसार,
युगों-युगों के इस बंधन संग,न हो उपेक्षा का व्यवहार,
नदियों से जीवन का रिश्ता,हमें हरहाल समझना होगा,
और जल संचयन का पाठ,हम सबको ही पढ़ना होगा।

वर्ना धरती पर बिखरी ये,मनभावन,हरियाली न होगी,
पशु,पक्षी,कीट और शिशुओं की किलकारी भी न होगी,
गर जल न रहा,वृक्ष न होंगे,तो आक्सीजन भी न बनेगी,
बिना प्राणवायु,इस जीवन की,फिर कहानी कैसे रहेगी।

जल का  महत्व जानके हम,इसकी उपलब्धता की सोचें,
जल संचय के उपाय निकालें,और जल संरक्षण की सोचें,
सदानीरा नदियाँ ये रहें और उनकी अमरता की भी सोचें ,
सोचें कि कैसे ये प्रकृति बचे,और भूजल बढ़ाने की सोचें।

जल संरक्षण हेतु इस जल को,व्यर्थ में न बहने दें हम,
वर्षा से प्राप्त जल,संचित कर,बेकार में न जाने दे हम,
नदियों अपनी स्वच्छ रखें,उन्हें प्रदूषित न होने दें हम,
गन्दगी,कूड़ा,पूजन-सामग्री फेंक बीमार न होने दे हम।

मृत पशु,मृत शरीर कदापि न,इन नदियों में बहाए जाएं,
अंतिम संस्कार को,इलेक्ट्रिक शव दाह गृह ही अपनाएं,
न डालें कारखानों का दूषित जल,इन पावन नदियों में,
वर्ना जीवन मुश्किल होगा,आगे आने वाली सदियों में। 

जल राशि का मूल्य जानें,ताकि भविष्य भयावह न रहे,
वृक्षों की तादाद बढ़ाएं,ताकि जल धरती में ही रुका रहे,
कुँए,पोखर व तालाब बनाएं,ताकि जल संचित होता रहे,
हर व्यक्ति जागरूक हो,ताकि जीवन धरती पे बचा रहे।

जल जीवन है,जल स्पंदन है,जल से है यह धरती जवान,
नदी बचाएं,नदी सहेजें,यही जल,जंगल,जमीन की जान,
इस आकाशगंगा में है केवल,पृथ्वी ही,जीवन की पहचान,
जल से ही जीवन संभव है,सबमें बांटना होगा यह ज्ञान।

                                                              ( जयश्री वर्मा )

Tuesday, November 15, 2016

प्रिय तुमको क्या कहूँ ?

भृकुटी तनी धनुष सी,चितवन यों जस तीर की धार,
हार न मानें,घायल करें तंज़ करते से ये शब्द प्रहार,
हृदय में खंजर सी उतरे,ये तीखी सी मादक मुसकान,
तलवार सा घायल करें,डिगा दे ये हौसलों की मचान,
जिसपर बरस पड़ें ले ये सब,समझो उसका बंटाधार,
प्रिय सच कहूं तुम तो हो,पूरा का पूरा ही शस्त्रागार!

चन्द्रमा सा मुखमंडल कहूँ,या सूरज लाली से कपोल,
तारों सी चमचम चमकती तुम्हारी चुनरी ये अनमोल,
मेरे मंगल,राहु-केतु,शनि सब तुम ही तो प्रिय साधो,
तुम मेरी देवी हो,भले ही पुकारो,मुझे मिटटी का माधो,
मेरे सुबह-साँझ की झाड़-फूंक का,तुम ही कर्मकांड हो,
मेरे घर के गृह-नक्षत्र का,प्रिय तुम पूरा ब्रह्माण्ड हो!

कमल सरीखे नयन,गुलाब पंखुड़ी से,ये नाज़ुक होंठ,
घुँघराली केश वल्लरी,मोगरा सजा,कुशलता से गोंठ,
हठपूर्वक मंगाया जो मुझसे,वो नवलखा गले में साजे,
मेरे अँगना में तुम्हारी पायल,रुन-झुन,रुन-झुन बाजे,
पावों की लाली ऐसी,ज्यों फूलों की सुर्खी ही रचा डाली,
तुम्हें क्या कहूँ प्रिय तुम तो हो,पूरी ही बगिया निराली!

धन्य हुआ हूँ पाकर तुमको,ये अहसास कराया मुझको,
तुम्हारा हुक्म पत्थर की लकीर,पूरा करना हम सबको,
तुमने तो इशारों पे उंगली के,है मुझे सारी उम्र नचाया,
फिर भी समाज में तुम संग रहके,सभ्य मैं हूँ कहलाया,
तारीफ़ सुन अपनी न थको तुम,ये है लीला अपरम्पार,
फिर भी प्रिये अति प्रिय हो मुझे,तुमसे मेरा घर-संसार!

                                                                                                ( जयश्री वर्मा )


Monday, October 24, 2016

"शुभ दीपावली"मनाएं

चलो दीप पर्व को,इस वर्ष,कुछ अलबेला सा मनाएं,
बुराइयों को बुहार के,आँगन में,खुशियों को ले आएं,
नवल वसन हों,भाव शुभता संग,आपसी प्रेम जगाए,
इस दीपावली को,मिल सब "शुभ दीपावली"बनाएं।

बढ़ाऊं दीपक,मैं हांथों से,और बाती को आप जगाएं,
विपरीत पवन,अगर तेज बहे तो,हथेली ओट बचाएं,
ले चलें उस,अँधेरी चौखट पे,जहां कहीं लगे वीराना,
हाथ बढ़ा के,नेह का सब मिल,जगमग दीप जलाएं।

शब्द सुनहरे आप चुनें,और संग में,सुरलहरी मेरी हो,
राग एक हो,तान एक हो,सबमें स्नेह लहर गहरी हो, 
गीत सरल हो,पकड़ गहन हो,जीवन संगीत सजाएं,
मधुरता से,गूँथ के हृदयों को,अपनत्व धुन बिखराएं।

रंग इन्द्रधनुष के,मैं समेट लूँ,कल्पनाएं आप सजाएं,
अल्पना के बेलबूटों में,सारे रंग,एकता के भर जाएं,
नारंगी,सफ़ेद,हरा रंग सुन्दर,सबसे ही प्रखर लगाएं,
इस दीपावली पर हिलमिल के,शुभता प्रतीक रचाएं।

मैं खुशियाँ,चुनकर ले लाऊँ,मुस्कुराहट आप फैलाएं,
मीठी बातों के संग हम,इक दूजे के,हृदयों बस जाएं,
धोखा,झूठ,मनमुटाव छोड़,मानवता को गले लगाएं,
इस त्यौहार,गले मिल आपस में,भाईचारा अपनाएं।

बिजली के बल्ब न हों,दीपों की झिलमिल लड़ी हो,
चेहरे पे मुस्कराहट सबके,खुशियों की फुलझड़ी हो,
भूखे पेट न सोए कोई भी,हर शख्स तृप्ति रस पाए,
स्वागत,सौहार्द से,मिलजुल सब मिलबांट के खाएं।

न हो उदासी,किसी ओर,खुशियों का अम्बार लगे,
न हो अंधियारा,कहीं पर,दीपक सारे जगमग जगें,
हिलमिल खुशियाँ,उमंग हृदय,अमावस को हराएं,
चलो हम सब मिल संग में"शुभ दीपावली"मनाएं।

                                                        ( जयश्री वर्मा )


Friday, October 7, 2016

कांटे की व्यथा

इक रोज़ पार्क में,बैठा था मैं,इक क्यारी के पास,
तभी आवाज़ आई,कुछ अपरिचित सी,कुछ ख़ास,
फिर चहुँ ओर मैंने,नज़र दौड़ाई,पर दिखा न कोई,
सोचा कि शायद,मेरे अंतर्मन का ही,भ्रम है कोई। 

फिर देखा,इक पौधे का काँटा,मुझको देख रहा था,
कुछ सवालिया सी दृष्टि,मुझ पर ही वो फेंक रहा था,
मैंने पूछा,क्या तुम्हें ही मुझसे,कुछ पूछना ख़ास है?
याकि मुझे यूँ ही,हो चला किसी भ्रम का,आभास है। 

वह बोला,ये सच है मैं तुमसे ही,मुखातिब हो रहा हूँ,
तुम भ्रम न समझो,मैं तुमसे सच में ही,बोल रहा हूँ,
कुछ सवाल हैं मेरे,मुझे तो तुम बस,उत्तर बतला दो,
मेरे मन की,यह उलझन,बस तुम जरा सुलझा दो।

मैं बोला,कि चलो कहो,क्या तुम्हारी प्रश्न-कथा है?
कह डालो,मुझसे आज,जो अंतरमन की व्यथा है,
वह बोला,क्यों भेद बड़ा है,मेरे और पुष्प के बीच?
जबकि एक डाल,रस,एक ही जल से गए हैं सींच।

तुम कवि हो कहो,तुम्हारा विषय,मैं क्यों न बना?
मुझपे,तुम्हारी लेखनी ने,भाव सुंदर क्यों न चुना?
फूल की ही,प्रशंसा पे तुमने,पोथियाँ हैं भर डालीं,
सारी ही सुन्दर उपमाएं,उसके नाम ही कर डालीं।

मैं कितना हूँ बलशाली,ज़रा मुझपे,नज़र तो डालो,
और कुछ,बेहतरीन नज़्में,मुझपे भी तो गढ़ डालो,
मेरी ताकत के आगे,देखो हर कोई,कमजोर पड़े,
मुझे छूने से मानव,तितली,भँवरे और पशु भी डरें। 

ताकत के कारण,उसके सर,दम्भ चढ़ा परवान था,
मैं उसकी घमंड भरी,मुस्कान पे,बहुत ही हैरान था,
मैं बोला कि,बुरा न मानो,तो मैं एक बात कहूँ भाई,
जिसको तुम,गुण समझ रहे,वही तो हैअसली बुराई।

शूल हो तुम,काम तुम्हारा,सिर्फ दुःख और दर्द देना,
सुख न देना कोई,बस,यूँ ही ताकत में,अकड़े रहना,
शूल से ही तो,सूली बनी,जिसका जान लेना काम है,
पुष्प भले ही,नाज़ुक सही,पर दिल मिलाना काम है। 

पुष्प तो,रंग दे जहान को,और खुशबूओं को नाम दे,
जन्म,मृत्यु,विवाह या मंदिर हो,हर जगह ही काम दे,
है पुष्प लचीला,हलकी हवा के,झोंकों में ही झूम ले,
जो भी उसे,प्यार से ले उठा,उसके हांथों को चूम ले।

दिलदार इतना कि,ओस की बूँदें भी,उस पर ठहर सकें,
रंग सुन्दर देख के,पंछी और तितलियाँ,आकर के रुकें,
इस प्यार और त्याग की तो,दुनिया ही पूरी दीवानी है,
गर कवि न मुग्ध हो,तो ये उसकी कलम की,नादानी है।

सारे जहां में रंग बिखेरे,ऐसा तिलस्मयी है उसका प्यार,
चरणों से शीश तक राज करे,ऐसे हैं उसके गुण हजार,
दुनिया भर में,प्रेम दिवस पे,जवां दिलों की वो आस है,
क्या अब तुम्हें अवगत हुआ,क्यों पुष्प दिल के पास है ?  

                                                                  ( जयश्री वर्मा)









 



Thursday, September 29, 2016

साथ तुम्हारा


साथ तुम्हारा पा के,ये जीवन,यूं खिल सा गया है,
जैसे ठहरी तंद्राओं को,इक वज़ूद सा,मिल गया है।

तुम्हारे इन हाथों में,जब भी कभी,मेरा हाथ होता है,
तो जैसे कि,मेरी खुदी का एहसास,तुम में खोता है।

तुम संग,मैंने जाना कि प्रकृति के रंग और भी हैं,
फूल,तितली,भंवरे,पंछी के गीत-गहन और भी हैं।

कि सब कुछ,लगे है कुछ अलग,और सुनहरा सा,
कि सोच पे से,जैसे उठ चला हो,धुंध का पहरा सा।

देखो जरा,इंद्रधनुष के ये रंग ज़्यादा चमकीले से हैं,
आज प्रकृति के,फैले राज़,जादा ही चटकीले से हैं।

कि आज ये धरती,आसमान,ये चाँद अपने से लगें,
जैसे प्रेम के,कई अध्याय,जेहन में एकसाथ जगें।

कि सूरज की,तपती लपट भी,शीतल सी लगती है,
और शीतल रात में,झुलसाती ख्वाहिशें,जगती हैं ।

सुबह की,मंद-मंद हवा,नए गीत गुनगुनाती सी है,
साँझ की,बोझिलता भी,नए उत्साह जगाती सी है।

कि तुमसे,मिलने को बेकरार,मन मेरा हो जाता है,
सामने तुमको,देख कर तृप्ति,और सुकून पाता है।

तुम संग,नया बंधन,कुछ अलग ही निराला सा है,
कि जैसे,सारा जहान मैंने,इन बाहों में सम्हाला है।

ये प्रेम बंधन,सृष्टि की हर जीवनी में,नज़र आते हैं,
ये बंधन,खुदा के साथ होने का एहसास दिलाते है।

काश कि! अपना ये संग-साथ,इतना प्रगाढ़ हो जाए,
मेरा तुम्हारा,वज़ूद मिट के,हम में तब्दील हो जाए।
                                                   
                                                                     जयश्री वर्मा
                                   

Friday, September 23, 2016

जल ही जीवन

जल के बिन किसी दशा में जीवन संभव नहीं हमारा,
जल संरक्षण ही अब रह गया जीवन का मात्र सहारा,
अन्धाधुन्ध जल दोहन से भविष्य बन रहा अंधियारा,
तब हाहाकार मचेगा जब,जल ही काल बनेगा हमारा।

जल,जंगल,जमीन स्थिति को गर हमने नहीं संवारा
डूबेगी सृष्टि उस सागर में जिसका कोइ नहीं किनारा
जलचर,थलचर,नभचर में ही है धरा का स्पंदन सारा
अंधाधुंध दोहन से बच पाएगा क्या ये संसार हमारा?

ये जीवन इसी लिए है क्योंकि धरती पर है जलनिधि,
इसे बचाने की कोशिश हमें करनी ही होगी हर विधि,
जल बिन तो यह धरती अपनी बन जाएगी शमशान,
शुष्क गृह कहलाएगी जीवन का न होगा नामोनिशान।

कठिन नहीं है बहुत सरल है जल संरक्षण का व्यवहार,
संरक्षण में चाहिए बस जागरूकता,ध्यान,ज्ञान-आधार,
जल क्षति बहुत हुई इसीसे,आज जल भी बना व्यापार,
जल के कारण ही है मिला हमें इस जीवन का उपहार।

जल जीवन है,जल औषधि है,जल सृष्टि और धरती है,
जल बर्बादी से आखिर जलनिधि की उम्र भी घटती है,
कुछ नियम हैं सीख सकें तो भविष्य भी सुरक्षित होगा,
जीवन सांस ले सकेगा तभी,जब जल संरक्षित होगा।

कुछ व्यवहार में लाने योग्य बातें....
जल संरक्षण होगा ......
जब घर का व्यर्थ जल गृह वाटिका के प्रयोग में आए,
जब टॉयलेट की फ्लश टंकी छोटे साइज़ की लगवाएं,
जब शेविंग समय नल की टोंटी लगातार खुली न छोड़ें,
घर की टपकती टोंटियों की तरफ अपना ध्यान मोड़ें।
जल संरक्षण होगा......
गर हम मुहीम छेड़ के बचे तालाबों को पाटने से रोकें,
जल संरक्षण होगा जब हम जंगल की कटान को रोकें,
जब अपनी सदानीरा नदियों को प्रदूषित होने से रोकें,
शासन-प्रशासन सक्रिय हो अपनी सारी ताकत झोंके।

उच्च शिक्षण तक जल संरक्षण अनिवार्य विषय बनाएं,
हर मानव अपने हिस्से का इक वृक्ष अपने हाथों लगाए,
जल ही जीवन इस स्लोगन का महत्व सभी को बताएं,
और जल संरक्षण की ये मशाल अगली पीढ़ी को थमाएं।

जल से पूर्ण धरती का सीमित जल ही है स्पंदन आधार,
ब्रह्माण्ड में हमें मिला इस जीवन का बहुमूल्य उपहार,
तो गर हम अपनी भावी पीढ़ी से करते हैं सचमें प्यार?
तो....
जल संरक्षण करके भविष्य पे करना होगा उपकार,
संरक्षण स्वयं ही होगा जब ये बन जाएगा व्यवहार।
                                            
                                                     (जयश्री वर्मा)

Tuesday, September 20, 2016

ज़िन्दगी क्या है ?

ज़िन्दगी क्या है ?

क्या ज़िन्दगी सवाल है ?
शायद ये सवाल है------
मुझे किसने है भेजा?कहाँ से हूँ मैं आया ?
क्या उद्देश्य है मेरा?ये जन्म क्यूँ है पाया ?
कब तक मैं हूँ यहां?और कहाँ मैं जाऊँगा ?
क्या छूटेगा मुझसे?और क्या मैं पाऊँगा ?
अपना कौन है मेरा?और पराया है कौन ?
किससे बोलूँ मैं?आखिर क्यों रहूँ मैं मौन ?
जिंदगी प्रश्नों से बुना इक जाल है।
हाँ !ज़िन्दगी इक सवाल है !

क्या जिन्दगी खूबसूरत है?
शायद ये ख़ूबसूरत है------

अनन्त ब्रह्माण्ड में विचरती पृथ्वी ये निराली ,
हर अँधेरी रात्रि के उपरान्त सुबह की ये लाली ,
फूलों के संग खेलते हुए ये भँवरे और तितली ,
सप्तरंगी सा इन्द्रधनुष और चंचल सी मछली ,
मधुर झोंकों संग झूमती बगिया की हरियाली,
क्षितिज पे अम्बर से मिलती धरती मतवाली।
जिंदगी विधाता की गढ़ी मूरत है।
हाँ !ज़िन्दगी खूबसूरत है !

क्या ज़िन्दगी प्यार है?
शायद ये प्यार है------
रिश्तों का प्यार और सारे बंधनों का सार ,
पाने और चाहने की इक मीठी सी फुहार ,
हौसलों से हासिल इक जीत का उल्लास ,
दुःख,सुख,प्रेम का है ये अनोखा अहसास ,
दोनों हाथों में भरके बहार को समेट लेना ,
कुछ प्यार बांटना कुछ हासिल कर लेना।
जिंदगी प्रेम का अजब व्यापार है।
हाँ !ज़िन्दगी इक प्यार है !

क्या जिन्दगी तलाश है?
शायद ये तलाश है ------
लक्ष्य कोई ढूंढना और फिर पाने की प्यास,
सतत् कोशिशों का इक निरंतर सा प्रयास,
तलाश स्वयं की,जन्म-मृत्यु,लोक-परलोक,
क्या जाने दूँ ,क्या सम्हालूँ,किसको लूँ रोक,
ज़िन्दगी की तलाश में उलझ-उलझ गया मैं,
कभी खुद के अधूरेपन से सुलग सा गया मैं,
जिंदगी तो आती-जाती हुई श्वाश है।
हाँ! ज़िन्दगी इक तलाश है!

क्या ज़िन्दगी कहानी है?
शायद ये कहानी है ------
अनादि काल से जीते-मरते असंख्य अफ़साने,
इतिहास के संग जो सुने-कहे गए जाने-अंजाने,
हर जीवन इक दूजे से मिलती-जुलती कहानी है,
स्वयं से स्वयं को रचने की इक कथा अंजानी है,
हमारा भूत और भविष्य ही हमारी ज़िंदगानी हैं,
आज हम वर्तमान हैं जो कल हो जानी पुरानी हैं,
जिंदगी कुछ अपनी कुछ वक्त की मनमानी है।
हाँ !ज़िन्दगी इक कहानी है !

जिंदगी के सवालों को उलझाता-सुलझाता रहा,
जिंदगी की खूबसूरतियों में खुद को डुबाता रहा,
प्यार पगी सी गरमाहटों को हृदय में भरता रहा,
कुछ पाने की तलाश मैं अनवरत ही करता रहा,
अपूर्ण,अतृप्त,अनभिज्ञ सा क्यों महसूस होता है?
सब कुछ है पास फिर भी अन्तर्मन क्यों रोता है?
खूब पढ़ा,जाना,परखा फिर भी अजब ज़िंदगानी है,
जिंदगी की परिभाषा,अब भी उतनी ही अनजानी है।
जिंदगी की परिभाषा-
अब भी उतनी ही अनजानी है।

                                               ( जयश्री वर्मा )




तुम आ जाओ

तुम आ जाओ कि देखो -
सांझ भी तो अब थकी-थकी सी हो चली है ,
गगन में पंछियों की कतारें लग रही भली हैं,
आपस में कह रहे दिनभर के शिक़वे गिले हैं,
नीड़ की ओर लौटते लग रहे कितने भले हैं,
आके देखो मैंने खुद को भी संवार लिया है,
चौखट पे भी रौशन कर लिया इक दीया है ,
कब से तुम्हारी बाट जोह रही हूँ घड़ी-घड़ी ,
हृदय में हलचल,कुछ सोच रही हूँ पड़ी-पड़ी ,
मैंने पांवों में अपने आलता भी तो है लगाया,
दिल के सोए हुए अरमानों को भी है जगाया,
देखो ज़रा पथिकहीन सूनी सी हो गई हैं राहें,
चाँद ने भी फैला दी हैं अपनी चांदनी की बाहें,
रात की शीतलता भी अब दिल जलाने लगी है,
विकलता भी तो किसी की नहीं हुयी सगी है,
दिन भर सुनती हूँ पपीहे की पीहू-पीहू के ताने ,
सखियों की छेड़छाड़ रहती है जाने-अनजाने,
कि यूँ जाया न करो कहीं दूर इतना तुम हमसे ,
रौशनी की तपन से नहीं,मन सुलगता है तम से ,
देखो अब तो घरों की कुण्डियाँ भी हैं लग गईं ,
और सोए हुए अरमानों की नींदें भी जग गईं ,
आ जाओ तुम कि-
अब मेरी विरह व्यथा इज़हार को तो समझो,
बुझे न मन की ये लौ,अरमान को तो समझो,
अब तो ये दीपक भी कंपकंपाने सा लगा है ,
मेरा इंतज़ार और श्रृंगार भी मुरझाने लगा है,
कि आ जाओ अब वरना मैं बेबसी से रो दूँगी,
तुम हो मेरे फिर भी मैं तुम्हें अपना न कहूँगी।


                                                   ( जयश्री वर्मा )