Saturday, July 1, 2017

ऐसा करते नहीं

ख्वाबों में जो भी निश्छल,मुस्कुरा रहा हो,
नींद से,उसको भूल कर भी,जगाते नहीं हैं।

रात-रात जो जागा हो,इंतज़ार में तुम्हारी,
उससे मुख मोड़ के,कभी भी,जाते नहीं हैं। 

जिसकी हँसी में,बसी हों,खुशियाँ तुम्हारी,
उसके माथे पे,शिकन कभी,लाते नहीं  हैं।

सुख दुःख के दिन-रात तो आते-जाते रहेंगे,
हिम्मत नहीं हारते,कभी भी,घबड़ाते नहीं हैं।

जो साया बन के आई है,जन्म भर के लिए,
दोष उसके,कभी भी,गिनते-सुनाते नहीं हैं ।

घर की इज़्ज़त तो,तुम्हारी ही पहचान है,
सड़कों पे उसकी,बात कभी,लाते नहीं हैं ।

गम को भले भुला देना,काली रात जान के,
ख़ुशी के,उजले-लम्हे कभी,भुलाते नहीं हैं।

गलत काम करने से पहले,सोचना कई बार ,
इंसानियत को कभी दागदार बनाते नहीं हैं।

दोस्ती के नाम,जो हाजिर हो,हर वक्त पर,
ऐसे रिश्ते में,शक़ की दीवार,उठाते नहीं हैं।

ज़ख्म दिए हों,जिन रिश्तों ने रह-रह कर,
उन राहों पे मुड़-मुड़ के कभी जाते नहीं हैं।

                                              ( जयश्री वर्मा )



Thursday, June 8, 2017

वही वादे वही कसमें

जन्म लेने के साथ ही जन्मी,
मेरी पहचान इस दुनिया में,
अजब विस्मित करें ये बातें,
जीवन मेरा ख्वाहिशें उनकी,
तमाम उम्मीदों के संग पालें,
वही मेरे वही अपने।
उंगली पकड़ के यूँ चलना,
सदा,नहीं मंजूर मुझको तो,
मुझे आवाज़ दे बुलाती राहेँ,
खुद की तकदीर गढ़ने को,
कोई न पूछे मेरी ख्वाहिश,
वही रोना वही झगड़े।

अचकचा के मैने चुन ली हैं,
अपने अन्तर्मन की जो राहें,
किसीके रोके से नहीं रुकना,
किसी के आगे नहीं झुकना,
कदम जिस भी ओर बढ़े मेरे,
वही मंजिल वही राहें।

कई मौसम फिर ऐसे बदले,
तमाम इंद्रधनुष भी मचले,
तमाम बातें हुईं दिलबर से,
तमाम बीतीं रंगीन सी शामें,
फिर वो इन्तजार सदियों का,
वही गाने वही नगमे।

सारी रात के रहे वे रतजगे,
सपने सोए से कुछ अधजगे,
ये झूमें दिल मेरा किस ओर,
पुकारे उसे बिना ओर छोर,
भटकूं मैं मृग मरीचिका में,
वही अगन वही तड़पन। 

वही बिखरना मुहब्बत का,
वही हतप्रभ सी जिंदगानी,
फिर नाम दिया उसे धोखा,
यही हर जवानी की कहानी,
बस वही हर बार का रोना,
वही फरेब वही बाहें।

फिर वो गृहस्थी की चक्की,
वही फिर कपड़े,रोटी की दौड़,
नई पीढ़ी की फिर से चिन्ता,
वही अधेड़ावस्था का मोड़,
बस जिम्मेदारियों का रोना,
वही झंझट वही लफड़े।

वही अंतिम छोर पे हूँ खड़ा,
विस्मित हुआ अब खुद से,
गलत सा चुन लिया जीवन,
नहीं सोचा था ये ऐसा कुछ,
ये कैसा है छल ज़िंदगानी का,
वही अफसोस वही आँसू।

अजब सी पहेली है ज़िंदगानी,
एक सी लगे सबकी कहानी,
सुख दुःख का बहता सा पानी, 
कहीं जन्मे और बस बह चले,
बिन मंजिल की अजब यात्रा, 
वही आना वही जाना।
                            
                             
                                                     ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, May 31, 2017

बेटी होने का मतलब

माँ की कोख के अंदर ज़िन्दगी में ढली मैं ,
पिता के हांथों के पालने में खेली-पली मैं ,
आँगन की चिरैया सी चहक-चहक के डोली ,
प्यारी मुस्कान के संग,खिलौनों की झोली।

भाई-बहन के रिश्ते का,पाया ढेर सा प्यार ,
सखियों संग सवालों,और जवाबों की बाहर ,
हर दिन,हर पल गुज़रा,ढलीं चांदनी रातें भी ,
बदले कई मौसम,गईं कितनी बरसातें भी।

ख़्वाब हुए जवान,यौवन रंग भी दिखाएगा ,
इंद्रधनुष पे सवार,कोई राजकुमार आएगा ,
सपने क्या थे बस,अपनी जादुई  दुनिया थी ,
रंगीन उधेड़-बुन से बुनी दिल की पुड़िया थी।

फिर माँ की चिंता और था बाबुल का हिसाब ,
पसंदी न पसंदी के,अजीब से सवाल-जवाब ,
फिर सात फेरों संग,बेटियां पराई बनाने की ,
ऐसी ही तो ये रीत है,घर-आँगन छुड़ाने की।

संग आई थी प्रीत लिए,हर रिश्ता निभाने को ,
दिखीं तौलती सी आँखें,बस बातें ही बढ़ाने को ,
ढेरों उम्मीदें और,जिम्मेदारियों भरा बोझ था ,
बात-बात पे टिप्पणी थी,ताना और क्रोध था।

मेरे सुनहरे से सपनों के पंख,क़तर दिए सारे ,
लक्ष्मण रेखा नियमों की,बिना किसी सहारे ,
अकेले ही चलना था,अकेले ही सम्हलना था ,
ससुराल के नियमों में,अकेले ही ढलना था।

ख़ुशी,उत्साह,ख़्वाबों ने,जिम्मेदारियां ओढ़ीं ,
प्रश्न,प्रश्न बस प्रश्नों ने,उम्मीदें सब छोड़ीं ,
काश! लोग सात फेरों के संग,अपना बनाते ,
शरीर संग सुख-दुःख और आत्मा अपनाते।

अपना बनाने को जो लाए थे ,तो अपना बनाते ,
पराया कहना क्यों,और क्यों शिकवा,शिकायतें
बेटे संग उसकी सहचरी को भी,गले से लगाते ,
पीढ़ी बढ़ाने वाली का भी,काश! सम्मान बढ़ाते ,

फिर न बिखरतीं,न चढ़तीं बेटियां दहेज़ बलि ,
न बेटी पैदा होने पे,समाज में मचती खलबली ,
न राहों में असुरक्षित,माहौल ही कोई मिलता ,
दोयम दर्जे का अहसास,यूँ न मन में पलता |

तो जीवन के मायने,अलग ही कुछ और होते ,
बेटी के जन्म लेने पर माँ-बाप,कभी न रोते ,
बेटी जन्मने पे भी घरों में,जश्न खूब मनाते ,
गर बहू-बेटियों को भी,हम बेटों सा अपनाते | 

                                                                 ( जयश्री वर्मा )






Saturday, May 20, 2017

तुम संग

शब्दों का रह-रह कर के,यूँ बातों में ढलना,
यहाँ-वहाँ,जहाँ-तहाँ की,उन बातों का कहना,
यूूँ शब्द-शब्द गुनना,और बात-बात जीना,
तुम संग तुममें ढलना,इक सुखद एहसास है।

मंजिलों की राहें हैं,बड़ी उलझी-उलझी सी,
कभी लगें बोझिल ये,कभी लगें सुलझी सी,
कदम-कदम साथ हो,और हाथों में हाथ हो,
तुम संग यूँ चलना,इक सुखद एहसास है।

वर्षा की रिमझिम,और कली-कली जगना,
फूल-फूल खिलना,और भंवरों संग डोलना,
गुज़रना मौसमों का,क्षितिज का ये मिलना,
तुम संग सब जीना,इक सुखद एहसास है।

तुम्हारी बातों की,उलझी-सुलझी सी तारुनाई,
अनजानी सी राहों की,अनजानी सी सच्चाई,
आसमान के अनंत संग,ये धरती की गहराई,
तुम संग यूँ समझना,इक सुखद एहसास है।

जीवन के उतार-चढ़ाव,ये जीवन की सार्थकता,
जीवन के येे गीत-राग,और जीवन की मधुरता,
शब्दों की मिठास भरा,छलकता सा ये प्याला,
तुम संग घूँट-घूँट पीना,इक सुखद अहसास है।

                                                                             
                                                                                         ( जयश्री वर्मा )

Monday, May 1, 2017

अनजानी,अनदेखी कल्पना

स्वर्ग की कामना समाई है,हर किसी के मन में,
और दुखों से पार,पाना चाहते हैं,अपने जीवन के,
धाम दर्शन करके प्रभु के,द्वार जाने की चाह है,
सभी पूजास्थल,ऊपरवाले को मनाने की राह है,
हर कोई स्वर्ग का दिल से तलबगार है,
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

जीवन की तकलीफों को जो असामान्य मान बैठे हैं,
मानो सुबह शाम,रात दिन के बदलावों से ही रूठे हैं,
यही जन्म तो है सत्य,और सत्य इसकी ये कहानी,
परलोक तो है अनदेखा,इसकी कथा भी है अनजानी,
कर्मलोक को भूल तर्पण को क्यों हैं बेकल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

कोई नहीं है शख्श,धरा पे,जो कि मृत्यु को पाना चाहे,
अपना घरद्वार भूले,और भूलना चाहे,अपनी ये राहें,
तो फिर जो मिला है उसको,क्यूँ न जी भर कर जियें,
तो क्यूँ न इस जीवन का,हर स्वाद घूँट-घूँट कर पियें,
दुखों से भाग क्यों देव द्वार की है चाहत।
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

ये सुन्दर रंग समेटे प्रकृति,ये झरने और ये नदियां,
प्रेम में रचे बसे रिश्तों से परिपूर्ण जीवंत ये दुनिया,
सहेजे हुए सुख-दुःख से भरी परिवार की ये बगिया,
ये रिश्ते-नाते,संगी-साथी,ये सुबह-शाम,ये गलियां,
फिर देव लोक को,दिखते क्यों हैं विह्वल?
तो...
उसे पाने को तो मित्र मरना पड़ता है।

मृत्यु से लौट किसने,किसे स्वर्ग का राज़ बताया?
इह लोक त्यागने का,किसके मन ख़याल आया?
ये पतलून की क्रीज़,मैचिंग कपड़े और ये साड़ी,
ये घर-द्वार,ये हाट,ये पड़ोस-पड़ोसी ये पनवाड़ी,
ये क्रीम,लिपस्टिक,झगड़ा,रूठना,मान मनुहारी,
सावन का झूला,गीत और बच्चों की किलकारी,
इस धरती के रंग हज़ार,और खूबसूरत नर-नारी,
ये शोहरत,सलाम,ये कुर्सी की हनक की चिंगारी,
कोई भी मोह इसका,न छोड़ सका,न छोड़ सकेगा,
इस सच्चाई को त्याग,भला अनदेखी से जुड़ेगा?
स्वर्ग-नर्क तो यहीं है,जीवन जीना इक कायदा है,
यूँ अन्धकार में,भटकने का,कोई नहीं फायदा है,
ये रिश्ते नाते,ये उनका रूठना मनाना ही सच्चे हैं,
मित्रों-ये जीवन के सुख-दुःख के खेल ही अच्छे हैं,
ये जीवन है अनमोल,यूँ अन्धविश्वाश में न अटकें,
और अनजानी,अनदेखी कल्पनाओं में न भटकें।
क्यों कि-
स्वर्ग के लिये तो मित्र मारना पड़ता है।
                                           
                                                      ( जयश्री वर्मा )

Wednesday, April 19, 2017

आज तो प्रिय मेरा रूठने का मन है

आज सुनो!प्रिय तुमसे,मेरा रूठने का मन है,
बस अपना वज़ूद ढूंढना है,नहीं कोई गम है,
तुम्हारा प्यार यूँही,नापने का मन हो चला है,
तुम भूले ध्यान रखना,क्या बुरा,क्या भला है।

आज तो सर में दर्द बड़ा,यही बनाना बहाना है,
असल में तो आज यूँ ही,तुमको आजमाना है,
तौलना है कि,तुम्हें मुझसे,कितना लगाव है,
लव यू कहने में,कितना सच कितना बनाव है।

क्या अब भी तुम मुझे,देख सब भूल बैठोगे ?
क्या सारे दिन आज,संग में मेरे ही ठहरोगे ?
क्या चाय संग फटाफट,ब्रेड बटर बनाओगे ?
क्या पानी संग दौड़के,सेरिडॉन ले आओगे ?

क्या बाम मेरे माथे पे,अपने हाथों से मलोगे ?
मुझे सुकून पाता देख,मन ही मन खिलोगे ?
मेरा मन बदलने को,फिल्म कोई दिखाओगे ?
या पंचवटी की,चटपटी चाट तुम खिलाओगे ?

या कहोगे चलो तुम्हें,पार्क हवा खिला लाऊं ?
या अमूल की पसंदीदा,बटरस्कॉच दिलवाऊं ?
या फोन मिला के,मेरी माँ से बात कराओगे ?
या खुदही यहां-वहां की,सुना मन बहलाओगे ?

तुम्हारी उदासीनता से,मेरा मन बौखलाया है ,
अपना महत्व जानने का,कीड़ा कुलबुलाया है,
क्या अब तुम्हें मुझसे,मुहब्बत ही नहीं रही ?
या मैं अब पुरानी हो चली हूँ,ये बात है सही ?

ये भी कोई जीवन है,न रूठना और न मनाना ,
तुम्हारा रोज ऑफिस और मेरा टिफिन बनाना ,
या बहुत साल संग रहते,सब आदत हो गई है ,
जो थी प्यार की खुमारी,कहीं जा के सो गई है।

तुम कामकाज पे जाते हो,मैं घर सम्हालती हूँ ,
न तो तुम कुछ कहते हो,और न मैं बोलती हूँ ,
मुझे तो ये पल-छिन,बिलकुल भी नहीं हैं भाते ,
हम मशीन की तरह,रोज के ये दिन हैं बिताते।

तुम चाँद तारों की अब कोई,बात नहीं हो करते ,
ये दिन बोरियत भरे अब तो,मुझसे नहीं हैं कटते ,
सो ! आज तो प्रिय मेरा तुमसे,रूठने का मन है ,
बस अपना वजूद ढूंढना है,और नहीं कोई गम है।

                                                               (  जयश्री वर्मा  )

Monday, April 3, 2017

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी

मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा,
धोखा नहीं चलेगा,प्यार के इस व्यापार में,
खुल के दुनिया के सामने,दम भरना होगा।

सूरज की लाली संग,आशाएं जगानी होंगी,
दिन भर मेरी गृहस्थी की,नाव चलानी होगी,
शाम ढले मेरी चाहतों के,संग ढलना होगा,
मैं हूँ शमा निःशब्द,मुझ संग जलना होगा।

सावन के सभी गीत,मेरे सुरों संग गाने होंगे,
मेरे जज़्बात पतझड़ में भी,गुनगुनाने होंगे,
घर की किलकारियाँ,गले से लगानी होंगी,
ऊँगली थाम के उन्हें,हर राह दिखानी होगी।

मायूसियों में,अपना कन्धा भी बढ़ाना होगा,
बाँहों के दायरे में बाँध कर,सहलाना होगा,
आंसुओं को मेरी पलकों में,नहीं आने दोगे,
खुशियों को कभी मुझसे,दूर न जाने दोगे।

जब मेरा ये वज़ूद,तुम्हारी पहचान बन जाए,
मेरा नाम भी जब,तुम्हारा नाम ही कहलाए,
मेरी हिफाज़त,तुम्हारे अरमान में ढल जाए,
तुम्हारे ख़्वाबों में जब,मेरा तसव्वुर घुल जाएं।

विवाह की सारी कसमों को,निभाना ही होगा,
हर सुख-दुःख में रहोगे साथ,ये जताना होगा,
कितनी भी विपत्ति हो,मुख नहीं फेरोगे कभी,
मेरे हो,मेरे रहोगे सदा,कहो यहीं और अभी।  

मौसमों के साथ,मुझे महफूज़ रखना होगा,
अपनी जान से भी ज्यादा,प्यार करना होगा,
मैं कितनी भी ढल जाऊं,संग मेरे रहोगे सदा,
सच्चा साथी होने का फ़र्ज़,पूरा करोगे अदा।

सच कहो कभी भी,भरोसा मेरा नहीं तोड़ोगे,
जीवन के झंझावातों में,अकेला नहीं छोड़ोगे ,
तब मैं तुम्हारी संगिनी,हमसाया बन जाऊँगी,
तुम्हारी हर परिस्थिति के साथ ढल जाऊँगी।
पर ----
मुफ्त नहीं मुहब्बत मेरी,तुम्हें झुकना होगा,
तुम सिर्फ मेरे हो,ये वादा तुम्हें करना होगा।

                                              ( जयश्री वर्मा )